कहानी, व्यंग्य, कविता, गीत व गजल

Monday, November 14, 2016

जुगाड़ रॉकेट छोड़ने की


जुगाड़ रॉकेट छोड़ने की

.... अरुण अर्णव खरे ....

                        दीवाली क्या आई सुबह से ही कालोनी के बच्चों का आना शुरुं हो गया - "अंकल, एक बोतल चाहिए रॉकेट चलाने के लिए"

                       पिछले साल भी बच्चे बोतलें ले गए थे अतएव इस वर्ष भी उनकी उम्मीद मुरारी जी पर टिकी हुई थी .. लेकिन उनकी श्री मति जी सारी बोतलें दीपावली से पूर्व ही कबाड़ी को समर्पित कर चुकी थी । मुरारी जी बच्चों को निराश होकर लौटता देख शर्मिंदा हुए जा रहे थे और श्रीमती जी का पारा थर्मामीटर तोड़ कर बाहर बाहर आने को बेताब था - "देखो क्या औक़ात है तुम्हारी कॉलोनी में .. बड़े तो बड़े बच्चे तक तुम्हें बेवड़ा समझते हैं और एक तुम हो इसे अपनी शान समझते हो "

                        श्री मती जी का बड़बड़ाना स्कूटर के फटे सायलेंसर जैसा चालू था कि मुरारी के फुफेरे भाई का बेटा गया । उसे देख कर श्री मती जी की आवाज़ में घिर्रररर के साथ ब्रेक लग गया । उसने दोनों के चरण छूकर आशीर्वाद लिया । खाया-पीया और जब उसके जाने का समय हुआ तो बोला - "ताई जी, हमें दो बोतलें दे दीजिए"

                         इतना सुनते ही श्री मती जी एक हज़ार डेसीबल की आवाज़ वाले बम की तरह फट पड़ीं - "चल भाग यहाँ से .. बड़ा आया बोतल लेने .. क्या बिहार और गुजरात के लोग रॉकेट नहीं चलाते .. पूँछ उनसे कैसे चलाते हैं .. नहीं बताते तो इसरो वालों से पूँछ .. कैसे छोड़ते हैं वे पी०एस०एल०वी० .. वो भी नहीं बताएँ तो गूगल पर सर्च कर .. पर दोबारा हमारे पास बोतल माँगने मत आना"

                       लड़का उल्टे पैर दौड़ लगाकर भागा । ग़ुस्से में ही सही पर श्री मती जी की कही गई बातों में मुरारी को उनकी विद्वता के दर्शन हुए । उसे एक प्रसंग याद आ गया । अमेरिका मे अनेक प्रयत्नों के बाद भी रॉकेट अपने लॉंचपेड से ऊपर ही नहीं जा रहा था । दूर से यह दृश्य देख रहे एक जुगाड़ू भारतीय से रहा नहीं गया, वह वहीं से चिल्लाकर बोला - "रॉकेट को पैंतालीस डिग्री झुकाकर फ़ायर करो"

                         हताश अमरीकियों ने ऐसा ही किया और रॉकेट सचमुच आसमान की ओर उड़ चला । सबने उस जुगाड़ू को घेर लिया और तरह तरह के प्रश्न दागने लगे । सकपकाए जुगाड़ू ने बताया - "भैया मैं कोई विज्ञानिक इज्ञानिक नहीं .. वो तो मेरा स्कूटर जब स्टार्ट नहीं होता तो मैं उसे झुकाकर स्टार्ट करता हूँ ..बस मेरा काम हो जाता है "

                          सच कहा उसने । सीधा आदमी कहाँ आसमान छू पाता है लेकिन टेड़ा आदमी पलक झपकते ही सफलता की ऊंचाईयॉं छूने लगता है । राजनीति तो टेड़े लोगो के लिए पहले से ही थी अब तो साहित्य तक में टेड़े लोगों का बोलबाला है ।

                         ख़ैर बात बोतल और रॉकेट की चल रही थी । लोग गूगल पर सर्च करके परेशान थे लेकिन वह भी असमर्थ नज़र आ रहा था और ऊलजलूल तरकीबें सुझा रहा था । हाऊ टू प्रोपेल रॉकेट इन दीपावली सर्च करो तो बॉटल-रॉकेट की टेक्नीक से लेकर बनाने तक की विधियाँ गूगल बता रहा है लेकिन विदाउट बॉटल लिखते ही बग़लें झॉंकने लगता है । दीपावली पर रॉकेट बोतल मे रख कर छोड़ने की सदियों पुरानी परंपरा है देश में जो जाँची-परखी और सौ फीसदी पुख़्ता है । अब जब बोतलों पर बिहार में सख़्त पाबंदी लगा दी गई है तो बच्चों के सामने रॉकेट छोड़ने का धर्म संकट खड़ा हो जाना स्वभाविक है ।

                       इस विषम स्थिति में फिर वही जुगाड़ू व्यक्ति काम आया । बच्चों को निराश देख कर वह चिल्लाया - "बच्चो, सरकार ने दारू पर पाबंदी लगाई है मैगी की सॉस पर नहीं । तुम सब मैगी की बोतलों से रॉकेट छोड़ो । बच्चे खुशी से उछल पड़े पर बिचारी मम्मियां दुखी हो गईं । जिन्होंने कुछ समय पहले ही सॉस की बोतल ली थी अब उनके सामने उसे बचाकर रंखने की समस्या सर उठाए खड़ी थी ।

 अरुण अर्णव खरे

डी-१/३५ दानिश नगर

होशंगबाद रोड, भोपाल (म०प्र०) ४६२ ०२६

मोबा० ९८९३००७७४४   ई मेल : arunarnaw@gmail.com


Monday, June 8, 2015

गजल
कहीं मेरे जख्म सूख ना जाएं

मेरे छंद बुझे-बुझे से हैं, इनमे थोड़ी चमक डाल दे |
गुमसुम भी लगते है ये, इनमे चिड़ियों जैसी चहक डाल दे |

मैं पीढ़ा को गीत बनाकर गाता हूं इसलिए गुजारिश है
कहीं मेरे जख्म सूख ना जाएं, इनमे थोड़ा नमक डाल दे |

जितने लिखने वाले है, उनमें ज्यादातर बिकने वाले है
वे भी गीत अमर लिख डालें, ऐसा कोई सबक डाल दे |

खरी खरी कहने वालों की बातें सुनता नहीं जमाना अब
वे भी दिल में जगह बना लें, कमसिन उमर की लचक डाल दे |

तुमको लगता है मेरे गीतों में, गजलों में कशिश नहीं है
तू जो चाहे कर पर उनमे दीवानापन बेहिचक डाल दे |

मेरे शब्दों की खुशबू भी दिग-दिगंत में फेले मौला
तू इतनी इनायत कर दे, शब्दों में थोड़ी महक डाल दे |

अरुण अर्णव खरे

Saturday, November 22, 2014

गजल
सदभाव बचाने निकला हूं

छुपे चेहरों की पहचान बताने निकला हूं |
रिसते जख्मों पर मैं मल्हम लगाने निकला हूं |

दुखों की आहट सुनकर व्यथित न होना कोई
इसलिए पीड़ा को गीत बना गाने निकला हूं |

भेड़ियों के आतंक से डरे हुए हैं लोग सभी
मै बेफ़िक्र सोते सिंहो को जगाने निकला हूं |

शिष्य भी महफूज नहीं गुरुओं के आवास में
ऐसे चेहरों से नकाब हटाने निकला हूं |

बस्ती-बस्ती आग लगा दी सियासतदारों ने
अब तो बचा-खुचा सदभाव बचाने निकला हूं |

हर नया दिन भोजन की थाली छोटी कर देता
लेकर भूखा पेट भजन सुनाने निकला हूं |

सारे शहर में मरघट सा सन्नाटा पसरा है
मै फिर से उसको जीवन लौटाने निकला हूं |

अरुण अर्णव खरे
गीत
मृगछोना मन

नीली गहराईयों में उभर आया प्रतिबिम्ब,
गुलाबी डोरों में बंध गया मृगछोना मन |

पहली नजर में ही
बीज प्रीति के अंकुरित हुए |
दिल की भाषा दिल ने पढ़ी
मन के भाव संप्रेषित हुए |
घट गए फासले सभी अपलक निहारते हुए
सांसों की उष्णता में हो गया सलोना मन |

उमंगों ने ले लिया फिर
इंद्रधनुषी आकार |
गगनचुम्बी सपनों को मिला
मनचाहा आधार |
इस उपकार का आभार व्यक्त कैसे करूं
सदा से चाहता था तुम्हारा ही होना मन |

अरुण अर्णव खरे

Wednesday, January 15, 2014

बुंदेलखण्ड

यह बुंदेलखण्ड की माटी है |
अनूठी इसकी परिपाटी है |
निराली इसकी आन-बान है |
नभ से ऊंची इसकी शान है |
       आओ शीष झुका, सम्मान करें |
       इसका गुणगान करें, गुणगान करें |

यह धरती हीरों वाली है |
यह धरती वीरों वाली है |
यह धरती सूफी संतों की |
यह धरती बड़े महंतों की |
यह धरती जीवन रागों की |
यह धरती इशुरी-फागों की |
यह धरती है बलिदानों की |
अल्हड़-मस्त वीर-जवानों की |
यह धरती है मर्यादाओं की |
और वीर प्रसूता माओं की |
यह धरती लक्षमीबाई की |
गाती गाथा तरुणाई की |
धरती साहित्य साधना की |
धरती संगीत आराधना की |
      इन सबसे इसकी पहिचान है |
      नभ से ऊंची इसकी शान है |


केन बेतवा की कलकल में |
टोंस-धसान की हलचल में |
विंध्य-पर्वत की श्रंखलाओं में |
अजेय किलों-कंदराओं में |
केशव भवभूति की वाणी में |
पदमाकर कवित्त सुहानी में |
अत्रि-जालव जैसे श्रषियों में |
भूषण, लालकवि से कवियों में |
सोनागिरि कुण्डेश्वर में |
नीलकंठ शिव कालिंजर में |
धूमावती मां व राम लला |
इन सबका है अशीष मिला |
नल-दमयंती का कुण्डलपुर |
कल्पवृक्ष की भूमि हमीरपुर |
        बुंदेलखण्ड का यह वितान है |
        नभ से ऊंची इसकी शान है |


भक्ति-वात्सल्य की रीति यहां |

चित्रकूट सरीखा तीर्थ यहां |
प्रभु राम यहां पर आए थे |
वन के बारह वर्ष बिताए थे |
वाल्मीकि का  जन्मस्थान यहीं |
हुआ तुलसी का उपादान यहीं |
रामायण यहां पर रची गई |
महाभारत भी यहां लिखी गई |
गवाह काल्पी का इतिहास है |
कण-कण मे बसे जहां व्यास है |
बात महोबा के कौशल की |
जो धरा है आल्हा-ऊदल की |
बड़े-बड़े योद्धा डरते थे |
                                                                               एक मारने से दो मरते थे |
                                                                                        कदमों में था जिनके जहान है |
                                                                                        नभ से ऊंची इसकी शान है |

द्वापर में छुपने आए यहीं |
वनवास काल में पाण्डव भी |
भीमकुण्ड व पाण्डव प्रपात |
रेखांकित करते यही बात |
यह धरा च्यवन श्रषि की भी |
मिट्टी कहती है कालिंजर की |
उनने आयुष का ज्ञान दिया |
च्यवनप्राश सा वरदान दिया |
गर्व सभी को खजुराहो पर |
जीवन चित्रित पाषाणों पर |
यहां मंदिर है सबसे हटकर |
मन में प्रीत जगाते पत्थर |
कण-कण में सौंदर्य छिपा है |
                       


मन का परम बोध लिखा है |
         सबको इस थाती पर गुमान है |
         नभ से ऊंची इसकी शान है |

हुए छत्रसाल से राजे यहां |
मुगलों के बजगए बाजे यहां |
बंगस जान बचाकर भागा था |
लेकर फौज बड़ी आया था |
युद्ध-कला मे प्रवीण बड़े थे |
जीवन में बावन युद्ध लड़े थे |
टोंस-नर्मदा तक सीमाएं थी |
यश से गुंजित सभी दिशाएं थी |
साहित्य कला के बड़े पारखी |
भूषण कवि की उठाई पालकी |
तभी कहा था - किसे सराहों |
साहू को या छत्रसाल को |
प्राणनाथ का आशीष मिला |
जिनने हीरों का उपहार दिया |
      पन्ना में अनुपम हीरा खदान है |
     नभ से ऊंची इसकी शान है |

एक झांसी वाली रानी थी |
इतिहास अमर मर्दानी थी |
नाम था जिसका लक्ष्मी बाई |
आजादी की लड़ी लड़ाई |
जब उसने मोर्चा खोला था |
ब्रिटिश सिंहासन डोला था |
थोड़ी मदद यदि मिल जाती |
फिरंगी जाते दे आजादी |
आजाद वर्षों रहे यहां पर |
बेतवा-तट पर साधू बन कर |
भगत सिंह शहीदे-आजम ने |
बम टेस्ट किया बबीना में |
दुर्गावती गोंडवी रानी |
महोबा उनकी जन्मदायिनी |
       इनसे आजादी की मुस्कान है |
       नभ से ऊंची इसकी शान है |

मैथिली शरण की जन्मभूमि |
महावीर द्विवेदी की कर्म भूमि |
राम कुमार से नाटककार |
इंदीवर सरीखे गीतकार |
वृंदावन से साहित्य-रत्न |
ध्यानचंद से पुत्र विलक्षण |
जिनसे साख बढ़ी हाकी की |
नीची मूंछ हुई हिटलर की |
सुबोध मुखर्जी से फिल्मकार |
प्रेम-राजेंद्र से अदाकार |
असगरी सी ध्रुपद गायिका |
उमा सरीखी जन नायिका |
बुंदेली मिट्टी की देन है |
सबको इस मिट्टी से प्रेम है |
       बुंदेली भाषा सरस जुबान है |
       नभ से ऊंची इसकी शान है |

अरुण अर्णव खरे