कहानी, व्यंग्य, कविता, गीत व गजल

Saturday, December 24, 2016


देवता

-- अरुण अर्णव खरे --



                        तोरन सींग आज बहुत प्रसन्न था । उसके बेटे सूरज सींग को बारवीं पास करते ही बड़े साब ने बर्कचार्ज में बाबू बना दिया था साथ ही यह भरोसा भी दिलाया था कि सूरज जैसे ही कंपूटर की परीक्षा पास कर लेगा उसे वह रेगुलर कर देंगे । इस खुशी को सबसे बाँटने तोरन साब से तीन दिन की छुट्टियाँ लेकर अपने गाँव आया था । तोरन के ख़ानदान में पहली बार कोई सरकारी बाबू बना था । उसके सारे सगे संबंधी या तो खेतिहर मज़दूर थे या फिर उसकी तरह साब लोगो के बंगलों पर काम करते थे । उसकी पत्नी पूनिया तो जैसे अपने मोड़े की उपलब्धि पर बौरा गई थी । दिन मे कितनी ही बार वह सूरज का माथा चूम चुकी थी . इसी खुशी मे उसने बिरादरी वालों को ग्राम देवता के चबूतरे पर पूड़ी-रायता जींमने का न्योता तक दे डाला था ।


                      
बड़े साब ने बोला था सूरज को सोमवार को ही ड्यूटी जॉइन कराने के लिए .. अतएव तोरन सूरज को लेकर इतवार को ही गाँव से वापस आ गया । सूरज की पोस्टिंग साब ने अपने चहेते कार्यपालन यंतरी के दफतर मे की थी । सूरज के काग़ज़ पत्तर पलटते हुए बड़े बाबू बिंदेसरी यादव ने पहले तोरन और फिर सूरज की ओर इतनी पैनी निगाहों से देखा कि दोनों ही सिहर गए । तोरन हाथ जोड़कर लगभग गिड़गिड़ाते स्वर में बोला - "कोनऊ कमी है का बाबू जी .. बचवा है .. आप समझा दो पूरी कर लावेगो .. मै तो कछू समझूँ न .. दूसरी जमात तक ही पड़ो है हमने"

                      "नहीं नहीं .. कोई कमी नहीं है .. सब काग़ज़ दुरुस्त हैं .." बिंदेसरी यादव बोले - "तुम्हें पता है कि लड़के के कितने नंबर हैं"

                      "नाँय मालूम मोए .. इत्तो पता है कि वाय फस्ट कलास आओ है और इंजीनरिंग को इम्तहान भी पास करो है तबईं बड़े साब ने ईखों बाबू बना दओ" - कहते हुए तोरन की आँखें गर्व से दमकने लगी ।


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तुम लड़के का कैरियर बरबाद कर रहे हो तोरन .. तुम्हारा लड़का तो हीरा है हीरा .. इसे क्यूँ बाबू बना रहे हो .. तुम बताओ सूरज .. कौन सा इंजीनियरिंग का इम्तिहान पास किया है तुमने " - बिंदेसरी ने उत्सुक निगाहों से दोनों की ओर बारी-बारी से देखा ।


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जी, पी०ई०टी० पास किया है .. एस०सी० की मेरिट लिस्ट में २३३वां नंबर है .. सब कहते हैं कि मनचाही ब्रांच मिल जाएगी .. पर बहुत पैसा लगता है पढ़ाई में .. बापू ख़र्च नहीं उठा पाएँगे .. बड़े साब ने कहा कि तुम्हें पक्की नौकरी लगा देंगे .. बहुत इंजीनियर बेरोज़गार घूम रहे हैं" सूरज ने बताया ।


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बड़े साब ने ऐसा कहा तुमसे" - बिंदेसरी ने आश्चर्य से पूंछा ।


                       "
हओ" - जवाब तोरन ने दिया - "हम कहाँ से लाखों लाते .. फ़ीस देवे खों .. वो तो साब बड़े दयालु हैं हम ग़रीबन पर .. जो इत्ती किरपा करत हैं"



                        बिंदेसरी बाबू ने सारे कागज व्यवस्थित किए और सूरज को आफिस में ज्वाइन कराने की आवश्यक कार्यवाही पूर्ण की | बिंदेसरी ने एक बार पुन: सूरज को सोचने के लिए कहा था पर कम पढ़ा-लिखा तोरन तो सूरज के बाबू बन जाने से ही सातवें आसमान पर जा बैठा था | वह तो बड़े साब की किरपा के तले स्वंय को दबा महसूस कर रहा था - उसे समझ में ही नहीं आया था कि बिंदेसरी बाबू बार-बार क्यूं पूंछ रहा है - कहीं उसका कोई स्वारथ तो नहीं है |

                          बिंदेसरी बाबू ने सूरज को ज्वाइन करवा लिया था | तोरन सूरज को वहां छोड़कर चला गया | शाम को जब दोनो मिले तो तोरन के मन में बहुत से सवाल थे | उसे कोई परेशानी तो नहीं हुई | ईई साब से उसकी भेंट हुई कि नहीं -- कुछ काम भी सीखा कि नहीं -- बिंदेसरी बाबू ने कोई गड़बड़ तो नहीं की -- आफिस के बाकी लोग कैसे लगे उसे --

                         "बापू -- बिंदेसरी बाबू जी ने फिर से मुझसे कहा था कि तुम्हारे जब इतने अच्छे नम्बर हैं तो तुम बाबूगिरि करके क्यूं अपना केरियर खराब कर रहे हो -- वह तो बड़े साब को भी इसका दोष दे रहे थे - कि उन्होंने जानबूझ कर मेरा केरियर खराब किया है -- वह कह रहे थे कि मुझे बैंक से लोन भी मिल जाता और कालेज की फीस भी माफ हो जाती"- सूरज जो पहले बड़ा खुश नजर आ रहा था, तोरन को कुछ उदास सा लगा |

                           तोरन को ध्यान आया जब उसने बड़े साब को सूरज के इंजीनरिंग में पास हो जाने की खबर सुनाई थी तो वह बहुत खुश नजर नहीं आए थे और जब उन्होंने सूरज को बाबू बनाने के लिए तोरन से कहा था तो नीला बिटिया भी बड़े साब पर नाराज हुई थी | उसे तो सूरज के बाबू बन जाने की इतनी खुशी थी कि उसे नीला की बात से दुख हुआ था | वह समझ नहीं पाया था कि नीला बिटिया क्यूं बड़े साब पर नाराज हो रही है |

                          "तुम बिंदेसरी बाबू की बातन खों दिल पे न लो बिटुआ -- हो सकत है बड़े साब ने कबहुं ऊंखों फटकारो हो जासे वो उनसे चिढ़त हो -- हमने बड़े साब की बरसों सेवा करी तबहुं उन्होंने तुमाओ इतनो ध्यान रखो -- हम गरीबन की आज सुनत कौन है -- हमाई बिरादरी में आज तक कोनऊ बाबू नई बनो हतो -- तुमने तो हमाओ नाम रोशन कर दओ -- तुम अब मन लगा के काम करो -- साब कछु दिन में तुमाओ परमोसन भी कर देहें --" तोरन ने सूरज को समझाते हुए कहा |

                           दो माह गुजर गए | सूरज ने आफिस का काम कुछ-कुछ सीख लिया था | सब उसके काम और लगन से खुश थे | तोरन और पूनिया की भी सारी बिरादरी में अपने बिटुआ की उपलब्धि के कारण इज्जत बढ़ गई थी | तोरन भी बड़े साब के इस उपकार के बदले दोहरे चाव से उनकी सेवा में लगा रहता था |

                            बड़े साब के इकलौते बेटे प्रियेश, यानि कि चिंकू बाबा का पढ़ने में मन नहीं लगता था -- बड़े साब इस कारण परेशान रहते थे | १२वीं में वह एक बार फेल हो चुका था और इसी साल उन्होंने उसका एडमीशन डोनेशन देकर किसी कालेज में कराया था | बिटिया नीला इस बात को लेकर बड़े साब से नाराज रहती थी और कभी-कभी उनसे सूरज का उदाहरण देते हुए उलझ जाती थी | नीला द्वारा सूरज का इस तरह पक्ष लेना तो तोरन को अच्छा लगता था पर बड़े साब से झगड़ा करना उसे नहीं सुहाता था | उसने एक दो बार अकेले में उसे समझाने की कौशिश भी की थी तो बिटिया ने "काका तुम नहीं समझोगे" कहकर चुप करा दिया था |

                            तोरन सींग पिछले चौबीस सालों से बोधराम निरंजन के घर पर काम कर रहा था । उस समय से जब निरंजन नया नया सहायक यंत्री के पद पर भरती हुआ था । उसकी पहली पोस्टिंग बुंदेलखंड के इलाक़े मे हुई थी जहाँ छुआ-छूत और ऊँच-नीच का भेद उस समय समाज मे कुष्ठरोग सरीखा जमा बैठा था । इस कारण बोध कुमार के घर पर कोई भी कर्मचारी काम करने को तैयार नहीं था । उसके पहले पदस्थ रहे मनोरंजन शुक्ल के घर पर काम करने वाले छुटके रैकवार और हरिलाल साहू ने साफ़-साफ़ मना कर दिया था - "साब हम घर पर काम नहीं करेंगे .. हमारी बिरादरी मे बात पता चल गई तो हम समाज से ही बाहर कर दिए जाएँगे .. हमारे बाल-बच्चों के विवाह तक नहीं हो पाएँगे .. और हमारा हुक्का-पानी, आपस मे उठना-बैठना तक हराम हो जाएगा ।"

                            सुनकर बोधराम सन्न रह गया था । एक झटके मे ही उसकी अफ़सरी धरातल पर आ गई थी । वह दोनों के ख़िलाफ़ अनुशासनहीनता का हंटर चलाना चाहता था लेकिन जिले के एक अनुसूचित जाति के बीडीओ के समझाने पर उसने अपना इरादा त्याग दिया था । घर के कामकाज के लिए उसने ननिहाल से दूर के एक रिश्तेदार तोरन को बुला लिया था और उसे घर पर ही सर्वेंट क्वार्टर मे रहने की जगह दे दी थी । तबसे निरंतर तोरन बोधराम के घर पर काम कर रहा था । बोधराम के कई ट्रांसफ़र हुए । शासन के नए बने प्रमोशन-नियमों के तहत जल्दी-जल्दी उसके तीन प्रमोशन भी हो गए और वह अपने साथ नियुक्त हुए अनेक अफ़सरों को पीछे छोड़ते हुए चीफ़ इंजीनियर बन गया । जल्दी-जल्दी बिना बारी के प्रमोशन पा जाने के बाद वह अहंकारी हो गया था और अपने साथी अफ़सरों तक से बदतमीज़ी करने लगा था । तोरन बोधराम के इस बदलते व्यवहार का साक्षी था | जिनसे कभी बोधराम सर कह कर बातें करता था तोरन ने बोधराम को उनसे ही कई बार बुरा सलूक करते देखा था |

                           चीफ़ इंजीनियर बनने के बाद अपने पहले दतिया दौरे पर बोधराम ने छुटके और हरिलाल सहित वृंदावन पटेल उपयंत्री को भी निलंबित कर दिया था । वे दोनों वृंदावन की साइट पर ही कार्यरत थे तथा वृंदावन के कहने पर ही अफ़सरों के घरों मे काम करते थे । अपनी पहली पोस्टिंग के समय से ही तीनों बोधराम के निशाने पर थे । पर दो माह के अंदर ही तीनों की बहाली के आदेश बोधराम को निकालने पड़े थे । कर्मचारी नेता भक्त चरण ने धमकी दी थी यदि चौबीस घंटे के भीतर निलंबन वापिस नहीं लिया गया तो उसके बंगले के बाहर तम्बू लगाकर भूख हड़ताल की जावेगी |

                           नौवीं मे पढ़ने वाली नीला को पिता का पक्षपाती व्यवहार पसंद नहीं आता था | भक्तचरण की धमकी के बाद जब बोधराम को पीछे हटना पड़ा तो वह बहुत आहत था | नीला तीनों की बहाली से खुश थी -- उसने बोधराम को थैंक्स बोला | बेटी के मुंह से ये सुनते ही वह बिफर गया | उसे लगा भक्तचरण के साथ ही उसकी बेटी भी उसकी मजबूरी का मजाक उड़ा रही है | वह बड़ी जोर से नीला पर चिल्लाया -- बिचारी रोती हुई अपने कमरे में चली गई |

                           बोधराम की पत्नि शामली ने उसे शांत करने की कौशिश की | बोधराम को भी लगा कि उसने अकारण ही नीला को इतनी जोर से डांट दिया है | उसने शामली से कहा - "तुम ही बताओ मै क्या करूं -- नीला हर बात में विरोध करती है - वह तो आरक्षण तक की विरोधी है -- यदि यह वैशाखी न होती तो शायद मैं भी इंजीनियर न बन पाता -- चिंकू के रंग-ढंग तुम देख ही रही हो -- बिना आरक्षण के वह कुछ बन कर दिखा सकता है क्या -- आरक्षण के बावजूद भी उसे ढंग की नौकरी  मिलेगी मुझे संदेह है "

                         "समय के साथ नीला भी सब समझ जाएगी -- इस उमर में बच्चे ऊंच-नीच नहीं समझते -- उसे भी क्लास में कौन एस सी का मानता है - उसकी पहिचान तो एक बड़े अफसर की बेटी की है -- ऊंची जाति के गरीब बच्चों को देखती है तो व्यथित हो जाती है - उसने आप सरीखे गरीबी के दिन ही कहां देखे हैं - आप उससे प्यार से बात किया कीजिये" - शामली ने सलीके से अपनी बात बोधराम के सामने रखी |

                         "तुम ठीक कहती हो शामली" - बोधराम ने कहा - "लेकिन नीला हर बात में हमारा विरोध करती है"

                         "सूरज के प्रति आपके रुख ने उसे आहत किया था -- उसे लगने लगा है कि आप स्वार्थी हैं -- आप किसी का हित नहीं कर सकते -- मुझे भी लगता है कि सूरज के लिए आपने सही निर्णय नहीं लिया था -- तोरन समझता है कि सूरज को बाबू बना कर आपने उस पर बहुत बड़ा अहसान किया है। वह तो आपको देवता समझता है" - शामली का स्वर बहुत संयत था | वह नीला का पक्ष बोधराम को समझाने का प्रयास कर रही थी साथ ही उसे यह भी ध्यान रखना पड रहा था कि बोधराम उसकी बातों से आहत महसूस न करे |

                        "शामली तुम भी मुझे गलत समझती हो -- पर मैने जो भी किया अपने बच्चों के भविष्य के लिए किया" - बोधराम के स्वर में कातरता थी -"तुम्हें याद है न, -- दतिया में कोई भी हमारे घर पर काम करने को तैयार नहीं था -- मै तोरन को नहीं लाया होता तो खाना बनाने से लेकर चौका-बर्तन भी तुम्हें ही करना पड़ता -- यदि तोरन जैसे लोगों के बच्चे भी अफसर बन जाएंगे तो फिर हमारे चिंकू का क्या होगा -- अफसर का बेटा होकर क्या बाबू बनकर धक्के खाने के लिए छोड दूं उसे -- किसी तरह चिंकू अफसर बन भी गया तो कौन मिलेगा उसके घर पर काम करने के लिए --  मैने सूरज को लेकर जो भी किया बहुत सोच समझ कर किया -- वह बाबू बनकर खुश है -- और तोरन भी"

                          शामली को कुछ भी नहीं सूझा कि क्या बोले | बाहर उसे कुछ गिरने की आवाज सुनाई दी तो वह बाहर निकली | हवा के झोंके से राधा-कृष्ण की मूर्ति गिरकर टूट गई थी | तोरन टुकड़ों को समेटते हुए अपनी झोली में रख रहा था |

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 अरुण अर्णव खरे

डी-1/35 दानिश नगर

होशंगबाद रोड

भोपाल (म०प्र०) 462 026

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ई मेल :  arunarnaw@gmail.com
आज २५ दिसम्बर २०१६ के सुबह सवेरे में प्रकाशित मेरा व्यंग्य -- आपके अवलोकनार्थ
http://epaper.subahsavere.news/c/15607789

सोनम गुप्ता बेवफ़ा नहीं है
--- अरुण अर्णव खरे ---

                सोनम गुप्ता कौन है कोई नहीं जानता - पर उसकी एक राष्ट्रीय पहिचान है । लोग नोट बदलवाने के लिए लाइनों मे खड़े हैं और चटखारे ले लेकर सोनम गुप्ता के क़िस्से इस तरह सुना रहे हैं जैसे वह उनके पड़ोस मे ही रहती हो । मदन मोहन मास्टर अपने बग़ल मे खड़े गोविंद रैकवार को बता रहे थे - "मुझे लगता है सोनम वही लड़की है जिसे हमने लांबाखेड़ा के स्कूल मे पढ़ाया था । उसे साथ मे पढ़ने वाले भगीरथ अहिरवार से लगाव था .. जात-पांत का लोचा था इसलिए दोनों को अलग होना पड़ा था .. हो न हो यह भगीरथ की ही करतूत है .. उसी ने सोनम को बदनाम करने की मुहिम चला रखी है"

"पर भाई साब .. सोनम गुप्ता कहाँ की है यह तो किसी को नहीं मालूम .. लांबाखेड़ा वाली है तो भगीरथ को लिखना चाहिए था .. मुझे तो कुछ और ही कहानी लगती है" - गोविंद बोले ।

"भाई साब आप कहाँ की लगाए हुए हैं .. बिचारा सोनवीर उसके चक्कर मे फँसकर बर्बाद हो गया" - दोनों की बातें सुन रहे दयाराम सोनटके ने अपनी टाँग अड़ा दी - "पता नहीं कितने और नोटों पर बिचारा सोनू अपना दर्द बिखेरेगा ।"

"सोनम गुप्ता ही बेवफ़ा क्यों .. क्या आज तक कोई मर्द बेवफ़ा नहीं हुआ .. " - लाईन मे खड़ी द्रौपदी बहिन चुप नहीं रह सकीं और बातचीत के बीच मे कूंद पड़ी - "हमारे एक रिश्तेदार ने ही दो-दो शादियाँ रचा ली है .. हमारे आफिस मे काम करने वाले बसंती लाल ने पचपन साल की उम्र मे बीवी को तलाक़ देकर २१ साल की लड़की को फँसाकर शादी कर ली .. लोगो को इनकी बेवफ़ाई नहीं दिखती।"

"अरे ये कोई सिरफिरा आशिक है .. जो दस रुपए को छोड़कर अब दो हज़ार के नोटों पर अपना दर्द उँड़ेल रहा है .. भला हो सरकार का जो वह दस हज़ार का नोट लेकर नहीं आई ।" भीड़ के एक अन्य समूह मे भी यही चर्चा चल रही थी ।

             तभी मुरारी जी दो-दो हज़ार के दो नोट हाथों मे पकड़े विजयी मुद्रा में बैंक से बाहर निकले । किसी ने तंज कसा - "भैया अच्छे से देख लेना .. कहीं नोट पर सोनम गुप्ता बेवफ़ा है तो नहीं लिखा है ।" भीड़ मे खड़े लोग खिलखिलाकर हंस पड़े ।

             बात-बात पर भयंकर रूप से भयभीत हो जाने वाले शेरसिंग सूर्यवंशी जी का अलग ही दर्द था - "भैया मैं तो सोनम का सो सुनते ही भयभीत हो जाता हूँ भले ही उसने सोना बोलने के लिए मुँह खोला हो या नींद की झपकी के लिए ... सो सुनते ही मैरी रूह कॉंपने लग जाती है कि फिर सोनम गुप्ता सामने आने वाली है"

"अरे तो आप ही सोनवीर हो क्या " बड़ी देर से लाइन मे लगे धीरज चौधरी अधीर होते हुए बोले ।

"मिल गया .. मिल गया .. सोनम ने जिससे बेवफ़ाई की मिल गया .." शांतिलाल श्रंगारी ज़ोर-ज़ोर से चीख़ने लगे ।

             तभी बैंक के बाहर नोटिस चस्पा कर दिया गया .. कैश समाप्त । नोट न मिलने की निराशा मे डूबे लोग कल फिर मिलने और सोनम गुप्ता के बारे मे लेटेस्ट अपडेट लेकर आने का कहकर विदा हुए ।

             अगले दिन बैंक की लाईन में कुछ ऐसे लोग फिर से खड़े मिले जो एक दिन पूर्व ही पुराने नोट बदलवा कर या कैश निकाल कर ले गए थे और आज उनका कोई काम बैंक मे नहीं था । उनसे कारण पूंछा तो झेंपते हुए फीकी सी हँसी हँसने लगे । तभी कोई बोल पड़ा - "सोनम गुप्ता की वजह से आए हैं ।"

"हाँ .. हाँ .. उसकी वजह से आए हैं .. सबने उसे बदनाम कर रखा है .. महिलाओं के क़िस्से सबको चटखारे ले लेकर सुनाने मे बड़ा मज़ा आता है .. दिल पर हाथ रखकर बोलो क्या सच मे सोनम बिचारी बेवफ़ा है" - बुधलाल की शेरसिंग नुमा दहाड़ सुनकर बहुत से लोग सकपका गए ।

"आप सौ फ़ीसदी सही कह रहे हैं .. सोनम बेवफ़ा है ही नहीं .. सोनवीर सोनम गुप्ता से एक तरफ़ा प्यार करता था .. लेकिन सोनम को इसका कोई इल्म ही नहीं था । जब सोनम की सगाई हो गई तो सोनवीर को अपना तंबू उखड़ता लगा और वह उसे बदनाम करने लगा ।" एक सज्जन बोले, .. सज्जन इसलिए कि महिलाओं का पक्ष केवल सज्जन लोग ही लेते हैं बाक़ी तो चीरहरण करते हैं । 

"सही कह रहें है ये ... पर सबसे ज्यादा बेवफाई तो आर बी आई कर रहा है .. सोनम गुप्ता तो बेवफ़ा हेई नहीं .. रोज नए फरमान लेकर चला आता है -- मुखिया जी की घोषणाओं तक को धता बता रहा है .. अब तक साठ बार अपने ही नियम बदल डाले हैं बेवफ़ा ने .. और आप है सोनम गुप्ता मे उलझे हैं .. इनकी बेवफ़ाई नहीं दिख रही किसी को ..." लगातार सोलहवें दिन भी जब सेवकराम चोकसे को बैंक की लाइन मे खड़े खड़े पैसे नहीं मिल पाए तो उनकी देश भक्ति पेट पर भारी पड़ने लगी थी ... " नोट पर ये  घोषणा लिख क्यूं नहीं देते कि है  किसी माई के लाल में दम जो खून-पसीने से कमाया पैसे हमारे पास से निकाल सके--"

अरुण अर्णव खरे

डी-1/35 दानिश नगर,

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Monday, November 14, 2016

गया प्रसाद खरे स्मृति साहित्य, कला एवं खेल संवर्द्धन मंच, भोपाल के तत्वावधान में आयोजित काव्य-गोष्ठी को कई स्थानीय चैनल्स का भरपूर प्रसाद मिला और उनके द्वारा गोष्ठी के समाचार को प्रमुखता से प्रसारित किया --




दिनांक 16-10 -2016 को श्री अरुण अर्णव खरे जी के दानिश नगर भोपाल स्थित निवास पर स्व. श्री गया प्रसाद खरे स्मृति कला, साहित्य और खेल संबर्धन मंच के तत्वावधान में सरस ,मधुर ,श्रेष्ठ आवासीय काव्य गोष्ठी जबलपुर से पधारे आचार्य श्री संजीव वर्मा 'सलिल' जी की अध्यक्षता में अत्यंत आत्मीयता पूर्ण और विशुद्ध साहित्यक वातावरण में सम्पन्न हुई ।आमंत्रित कवियों में भोपाल के सुधी स्वनामधन्य कवियों में श्री यतींद्र नाथ राही जी, आचार्य श्री राम बल्लभ शर्माजी, श्री मोहन तिवारी जी,श्री राजेन्द्र... शर्मा 'अक्षर' जी, श्री रवि प्यासी मीत जी, श्री अशोक व्यग्र जी ,दानिश जयपुरी जी,श्री दिनेश प्रभात जी ,श्री अरुण अर्णव खरे जी, श्री घनश्याम मैथिल अमृत जी,श्री मुसाफिर व्यास जी ,श्री कुशवाहा जी आदि अनेक कवि और सुश्री ममता बाजपेयी जी , सुश्री कांता राय जी और सुश्री सुनीता यादव जी ने अपने सुमधुर और मनोहारी काव्य पाठ से गोष्ठी को गौरवान्वित किया ।मुझे भी काव्य पाठ का अवसर मिला । गोष्ठी का विद्वता पूर्ण और प्रभावी संचालन श्री घनश्याम मैथिल अमृत जी ने किया ।सभी आमंत्रित रचनाकारों को श्री अरुण अर्णव खरे जी के द्वारा स्मृति चिन्ह भेंट स्वरूप प्रदान किए गए ।सौ. श्रीमती खरे के स्नेहपूर्ण आतिथ्य ने गोष्ठी को और अधिक भव्यता से अलंकृत कर दिया ।हार्दिक आभार ।