कहानी, व्यंग्य, कविता, गीत व गजल

Tuesday, May 7, 2013

पितामह, अब तो प्रतिज्ञा तोड़ो तुम


गीत
और कितने चीरहरण देखोगे,
पितामह, अब तो प्रतिज्ञा तोड़ो तुम |

सौगंध की ढाल पितामह
अब और काम नहीं आएगी |
तुम पर गर्व करने वाली
पीढ़ी भी स्वंय लजाएगी |
इतिहास युगों-युगों तक कोसेगा
अब साथ दुर्योधन का छोड़ो तुम |

इसी शपथ के कारण ही तुम
बैचैन रहे जीवन भर |
और अंत समय में भी तुमको
सोना पड़ा शर-शैय्या पर |
इच्छा-मृत्यु भी नहीं मिलेगी अब
इसलिये तो सही पक्ष रथ मोड़ो तुम |

सिंहासन के प्रति निष्ठा ने
बड़ा अहित किया मानवता का |
कैसा विद्रूपित चेहरा अब
सामने आ रहा सत्ता का |
सिंहासन जाता है जाए पितामह
अपनी लाज बचाने तो दोड़ो तुम |

Monday, April 15, 2013

बहुत चाहा


बहुत चाहा
तुम्हारी छवि को नयनों से निकालना,
पर दर्पण से प्रतिबिम्ब के अलग होने सा
अनहोना है यह
बार-बार 
इस बात का सत्यापन होता रहा |

बहुत चाहा
तुम्हारे नाम को ह्रदय से निकाल कर
हवा में उछालना
पर चुम्बक से लोहे के विकर्षण सा
असंभव है यह
बार-बार 
इस बात का उदाहरण मिलता रहा |

बहुत चाहा
तुम्हारी यादों को मन से निकालकर
विस्मृति मे सजा देना
पर गुलाब से सुरभि की विमुक्ति जितना ही
अनैसर्गिक है यह
बार-बार
इस तथ्य का प्रतिपादन होता रहा |

अतएव
संभव नहीं हुआ
तुम्हारी छवि को ह्रदय से निकालना
तुम्हारा नाम हवा में उछालना
तुम्हारी यादों को विस्मृति मे सजा पाना
तुम
कोसों दूर रह्कर भी
यहीं कहीं आस पास लगते हो
तुम्हारी सुधियां जब तब
शांत ह्र्दय-सरोवर में कंकर फेंक
लहरों को लहरा देती हैं
मुरझाते गुलाब की पंखुडियों को
फिर से खिला देती हैं
ऐसे ही क्षण तब
अमूल्य धरोहर बन जाते हैं |
और एक एक क्षण में हम
सौ-सौ युगों की जिंदगी जीने का
असीम सुख पाते हैं |

मुझको क्या भय


चुभन को पाले हुए हम अपने पांवों में |
मुझको क्या भय
मैं तो दर्द-दुखों के गुरुकुल का स्नातक हूं |

फूलों से ज्यादा मुझको कांटे भाते हैं |
तट को छोड़ ज्वारों से मेरे नाते हैं |
कितनी बार पा चुका मैं कष्टों में अबतक |
प्रथम श्रेणी प्रथम आने पर स्वर्ण पदक |
दुश्मन को शरण रखे हम अपने गांवों में,
मुझको क्या भय
मैं तो जंजालों वाले रूपक का नायक हूं |

अच्छे लगते हैं महलों से ज्यादा खंडहर |
प्रिए लगते हैं मुझको कोलाहल के स्वर |
कितनी बार कटु अनुभवों में बुना गया मैं |
समूचे विध्यालय का प्रतिनिधि चुना गया मैं |
मंजिल सदा तलाशी है पथरीली राहों में,
मुझको क्या भय
मैं पतझरी गीतों का सच्चा गायक हूं |

Friday, April 5, 2013

पहली नजर में प्यार का ...

 

Tuesday, February 26, 2013

जिंदगी मे प्यार फिर

थोडा सा सुक्रोज हो, थोडा सा सोडियम |
जिंदगी मे प्यार फिर, कभी ना होगा कम |


आइसोटोप प्यार के, कोई होते नहीं |
होता है नयूकिलयर भी, इसका और कहीं |
अपने आप में परिपूर्ण वेलेंसी इसकी,
केमिकल-बाण्डिंग भी ऐसी, है कहीं नहीं |
मन की उमंगें, तरंगें बन पहुंचती जब
रेडियोएक्टिव होता तन, जैसे थोरियम |  जिंदगी मे प्यार फिर ***


न दाब, न ताप पर, प्यार रूप बदलता नहीं,
मन होता है हलका, जैसे हीलियम भरी |
मुस्कान करती है किसी कूलेंट सा असर,
जब रूठते है वह, दिल होता है मरकरी |
वासना का एसिड यदि मन-जार मे नहीं है,
देखिए दमकेगा प्यार भी जैसे रेडियम |  जिंदगी मे प्यार फिर ***

Monday, February 25, 2013

सरहद से संदेशा मां के नाम

सरहद से मां मैं तुमको, अपना प्रणाम भेजता हूं |
बाबू को पैरीपौना, सबको राम राम भेजता हूं |


अबकी बरस है सुना वहां, गांव में सर्दी बहुत पडी |
मां तुम जलाकर रखती हो ना, रोज ध्यान से सिगडी |
नई रजाई सिलवा ली तुमने और बाबू को बंडी |
या बिट्टो को शाल दिला, ऐसे ही गुजर-बसर कर ली |
सच बतलाना मां कैसा है गठिया, खांसी बाबू की
बनवा कर जडी-बूटी वाला काढा, बाम भेजता हूं |


अगली बार छुट्टी लेकर जब भी मैं घर पर आऊंगा |
कम से कम एक धाम की मैं तुमको सैर कराऊंगा |
अट्ठारह की होगी बिट्टो अगले साल जुलाई में |
उसके लिए है रिश्ता भेजा, साथी की एक ताई ने |
धूमधाम से विदा करेंगें अपनी रानी बहना को,
पाती के संग रख आशीष, उसके नाम भेजता हूं |


दुश्मन तो काफिर है, लाशों के भी शीश काटता है |
हम सामने पड जाएं अगर, दिखाकर पीठ भागता है |
सच कहता हूं एक बार ये बंधे हाथ खुल जाएं अगर |
शत्रु की इंच-इंच धरा पर, लहरा देंगें तिरंगा फर फर |
हर वतन परस्त प्रण ले अभी, लगाकर माटी सिर पर
दुश्मन की धरती पर रखकर पांव, पैगाम भेजता हूं |


सौगंध मुझे गंगा, यमुना सतलज मे बह्ते पानी की|
राणा सांगा, प्रताप, शिवाजी की शौर्य-कहानी की |
हर बहना की राखी की  चौपालों की खलिहानों की |
सैखों, हमीद और योगेंद्र जैसे वीर जवानों की |
दुश्मन की पाप कहानी का उपसंहार लिखेंगें अब,
सरहद से यही संदेशा जन-जन के नाम भेजता हूं |


सरहद से मां मैं तुमको, अपना प्रणाम भेजता हूं |
बाबू को पैरीपौना, सबको राम राम भेजता हूं |

Friday, February 15, 2013

घर को तुमने शिवालय बनाया

मरूथल सा नीरव था जीवन मेरा,
तुमने शुभ-सुरभित चमन बना दिया |
लिखकर जिंदगी के दोहे सरस,
कोरे पृष्ठों को रामायण बना दिया |


तुमने होंठों से ना जितना कहा,
उससे अधिक वाचाल नयनो से कहा |
पहली मुलाकात मे जुबां ना खुली,
पर मन है ना फिर कभी बस मे रहा |


सुधियों से तुम्हारी मन कंचन हुआ,
साथ ने  देह को सुदर्शन बना दिया |
लिखकर जिंदगी के दोहे सरस ***


जिंदगी मे हर कदम कदम पर तुम,
छाया बनकर मेरे संग संग चले |
हताश ना कर सके मुझको कभी,
पथरीले रास्ते हों या फिर जलजले |


हर परीक्षा में सफल हम हुए और, 
मुझे महकता हुआ चंदन बना दिया |

लिखकर जिंदगी के दोहे सरस ***

तुमने रोपे थे जो पौधे कभी,
सुगंध उनकी भी अब छाने लगी है |
और सुवासित होगी बगिया हमारी,
ये उम्मीदें भी मन में जगी है |


घर को तुमने शिवालय बनाया,
जीवन-सफ़र को तीर्थाटन बना दिया |
लिखकर जिंदगी के दोहे सरस ***